वीडियो में देखें, जब खुले आम ऑटो रिक्शा में युवती के साथ हुई छेड़खानी

जिस तरह हाथ की पाँचों उंगलियां बराबर नहीं होती कोई छोटी और कोई बड़ी होती हैं, ठीक उसी तरह होते हैं इंसान। हर किसी को हम एक ही तराजू में रख कर तौलें, तो ये कहा का इन्साफ हुआ। तो हम बात कर रहें हैं, देश के बहुचर्चित विषय ‘महिला सशक्तिकरण’ पर।

ऐसा नहीं है कि देश में इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ है, अरे सुषमा स्वराज जी के ट्वीट्स को ही ले लीजिए कैसे उन्होंने आगरा में रहने वाली एक अँगरेज़ महिला को उसके हिंदुस्तानी परिवार से मिला दिया, जो उसे दहेज़ के लिए प्रताड़ित करता था। सरकार इस संदर्भ में बहुत से उचित कदम उठा रही है, लेकिन क्या समाज भी इसमें सरकार के साथ है??

एक तरफ जब बात अपने परिवार पर आती है तो लोग मासूम बन जगतें हैं, लेकिन जब सब इतने ही मॉसोम हैं तो ख़बरों में बलात्कार, उत्पीड़न और छेड़खानी के घटनाएं क्यों है? क्या हम खुद इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? पुरुष हो या स्त्री उत्पीड़न किसी का भी हो सकता हैं। लेकिन ऐसा कौनसा जरुरी कदम है, जिससे हम पीछे हट जातें हैं? सोचिये….

जवाब है अपराध के खिलाफ आवाज़ उठाना। अपराध सहना भी उतना ही गलत है जितना करना और अगर हर व्यक्ति यह प्रण ले ले कि न तो उसे जुर्म करना है और न ही उसे सहना, तो देखिये कैसे यह देश और भी बेहतर बन जाता है। आये दिन हम छेड़खानी की घटनाओं के बारे में सुनते हैं और कई महिलाएं इससे तंग आ कर आत्महत्या जैसा आपराधिक कदम भी उठा लेतीं हैं, लेकिन अगर वो इसका जवाब देने की ठान लें, तो किसी के अंदर क्या ऐसी हरकतों के लिए हिम्मत जाग पायेगी, इस सवाल का जवेब इसी वीडियो में है, देखें और खुद निर्णय लें।

 

 

 

 

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