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अद्भुत है भगवान शंकर का नटराज रूप, क्या आप जानते हैं भगवान शिव के इस रूप का रहस्य

भगवान शंकर क्या हैं, उनके बारे में कुछ भी बतानें की जरुरत नहीं है। सनातन धरम में त्रिदेवों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रभावशाली देवताओं में भगवान शिव को पहला स्थान दिया गया है। शक्तिशाली मानें जानें वाले भगवान शिव की लीलाएं और उनका विविध स्वरुप हमेशा से ही लोगों के लिए रहस्य बना रहा है। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप और हरिहर स्वरुप गुप्त युग के भारत तक अपनी महत्ता स्थापित कर चुका था। भगवान के हरिहर स्वरुप के बारे में कहा जाता है कि इसका प्रवर्तन शैव और वैष्णव धर्मों के बीच जारू हुए भक्ति रक्तपात के समापन के लिए हुआ था।

शिव से जुड़े कथन होते गए प्रचलित:

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जबकि अर्धनारीश्वर रूप के बारे में कहा जाता है कि सिका प्रवर्तन नर-नारी को एक दुसरे के पूरक के रूप में दिखानें के लिए हुआ था। इसी तरह भगवान शिव का एक और स्वरुप है नटराज का, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह विषयक धारणा आनंदम तांडवम से जुडी हुई है। जैसे जैसे भगवान शिव की अध्यात्म जगत में मान्यता दृढ़ होती गयी वैसे-वैसे उनसे जुड़े हुए कथन प्रचिलित होते गए। इसी में से एक उनका नटराज स्वरुप भी है। नटराज का अर्थ है नृत्य करने वालों का सम्राट। यानि जो भी इस संसार में नृत्य करता है, उसका नेतृत्वकर्ता। इस चराचर जगत की जो भी सर्जना और विनाश है उसके निर्देशक की भूमिका अदा करनें वाले को भी नटराज कहा जाता है।

पतंजलि ने करवाया था शिव के नटराज स्वरुप का निर्माण:

भगवान शिव के नटराज स्वरुप की उत्पत्ति से जुडी हुई दो धारणाएं हैं। पहली धारणा के अनुसार दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य में आठवी से दशवीं शताब्दी के बीच इसका विकास हुआ था जबकि दूसरी धारणा के अनुसार शिव के इस रूप का विकास पल्लव साम्राज्य के तहत सातवीं शताब्दी में हुआ था। हालांकि इससे जुड़े हुए कोई अन्य पुख्ता सबूत नहीं हैं केवल चिदंबरम में स्थित नटराज की भव्य मूर्ति ही इसका उदहारण है। इस मंदिर का निर्माण योगसूत्र के प्रणेता पतंजली ने करवाया था। योगेश्वर शिव के रूप में इस मूर्ति को निरुपित करते हुए पतंजली ने इसे बनवाया था।

पृथ्वी का विनाश करके देते हैं ब्रह्मा जी को पुनः निर्माण का आमंत्रण:

नटराज का जन्म शिव के उस स्वरुप को महिमामयी बनाने के लिए हुआ जिसका अर्थ बहुआयामी और बहुपक्षीय है। ऐसा माना जाता है कि नटराज के स्वरुप में शामिल प्रतिक चिन्हों का भी अपना एक ख़ास महत्व है। तांडव स्वरूप में नटराज एक बौने राक्षस के ऊपर नृत्य कर रहे हैं। यहाँ पर बौने राक्षस को अज्ञानता के प्रतिक के रूप में दर्शाया गया है, तथा मग्न होकर शिव का उसके ऊपर नाचना यह दर्शाता है कि अज्ञानता के ऊपर विजय पा ली गयी। शिव की इस मुद्रा को आनंदम तांडवम में रूप में जाना जाता है। इसी तरह से नटराज के उपरी बाएँ हाथ में अग्नि है जो यह दर्शाती है कि भगवाना शिव पृथ्वी का विनाश करके पुनः ब्रह्मा जी को श्रृष्टि निर्माण का आमंत्रण दे रहे हैं।

होता है सभी जैव-अजैव का एकीकरण:

इसी तरह भगवान शिव का दूसरा बांया हाथ उनके उठे हुए पैरों की तरफ संकेत करता है, जिसका अर्थ स्वतंत्रता से है। भगवान शिव अपने इस स्वरुप के द्वारा सार्वभौम स्वतंत्रता का उद्घोष करते हैं। नटराज की लयबद्ध नृत्यरत स्थिति स्वयं ब्रह्माण्ड की लयबद्धता का उद्घोष करती है। एपीआई इस स्थिति के द्वारा नटराज संसार को यह सन्देश देते हैं कि बिना गति के जीवन संभव नहीं है और जीवन के लिए लयबद्धता का होना जरुरी है। आनंदम तांडवम की अवस्था समस्त ब्रह्माण्ड के आनंदित होकर नृत्य करनें की अवस्था है। अज्ञानता और अहंकार का विनाश होकर पंचमहाभूतों सहित समस्त जैव-अजैव का एकीकरण होता है।

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