राजनीति

क्या औरंगजेब के पाले में खड़े हो गए उद्धव ठाकरे? औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने को लेकर बवाल

जिन बाल ठाकरे और उनकी पार्टी शिवसेना ने औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजीगर करने की मुहिम छेड़ी थी, विडंबना देखिए उन्हीं के बेटे उदधव जब सीएम बने हैं तो औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने पर सियासत गर्म हो गई। लोग पूछ रहे कि आखिर क्यों उद्धव को औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने में दिक्कत आ रही है।

महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले का नाम संभाजीनगर करने को लेकर सियासत की जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ भाजपा और तो दूसरी तरफ शिवसेना खड़ी नजर आ रही है। सोमावर (23-मई-2022) को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेन्द्र फडणवीस ने एक औरंगाबाद में एक रैली की और औरंगाबाद का नाम बदलने को लेकर सत्ताधारी पार्टी शिवसेना से सवाल पूछें।

Uddhav Thackeray

1980 में पहली बार उठी मांग

1980 के दशक में शिवसेना एक राजनीतिक पार्टी के रूप में महाराष्ट्र में तेजी से उभर रही थी। उस समय राज्य में बाला साहब ठाकरे को हिन्दुत्व का बड़ा चेहरा रूप में पहचान मिलनी शुरू हुई थी। उस समय 1988 में औरंगाबाद नगर निकाय चुनाव में शिवसेना को 27 सीटें मिली थी, जिसके बाद बाल ठाकरे ने सांस्कृतिक मंडल ग्राउंड में विजय रैली को संबोधित करते हुए औरंगाबाद का नाम बदलकर पहली बार संभाजीनगर करने की मांग की थी, लेकिन अपने जीवनकाल में बाल ठाकरे औरंगाबाद का नाम नहीं बदल पाए थे।

उस रैली के बाद से शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने औरंगाबाद को संभाजीनगर कहना शुरू कर दिया और आज भी शिवसेना के मुखपत्र में सामना में औरंगाबाद को संभाजीनगर कहा जाता है, यही वजह है कि भाजपा के बार- बार सवाल पूछने के बावजूद भी शिवसेना इस मुद्दे पर कांग्रेस और एनसीपी से गठबंधन के कारण शांत दिखती है। वहीं, पिछले दिनों मस्जिदों में लाउडस्पीकर का मुद्दा उठा चुके मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भी रविवार को हुई पुणे रैली में औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर करने की बात कही थी।

बता दें, मुगलशासक औरंगजेब की मृत्यु महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में हुई थी, जिसका मकबरा आज भी औरंगाबाद में मौजूद है और उसी नाम पर शहर का नाम औरंगाबाद रखा गया था।

कौन थे संभाजी

छत्रपति संभाजी महाराज मराठा शासक छत्रपति महाराज के बड़े बेटे थे। शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद 3 अप्रैल 1680 को उन्हें मराठा साम्राज्य की कमान सौपी गई। संभाजी महाराज अपनी वीरता के लिए मशहूर थे उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध लड़ बीजापुर और गोलकुण्डा जैसे महत्वपूर्ण दुर्गों को आज़ाद कराया था। एक युद्ध के दौरान औरंगजेब ने उन्हें पकड़ लिया और यातनाएं दी और 11 अप्रैल 1689 को मुगलों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी।

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