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हमला होने पर काशी पंडितों ने कहां रखा ‘शिवलिंग’, क्या था औरंगजेब का फरमान, जाने यह सत्य तथ्य

वाराणसी कोर्ट में ‘शिवलिंग’ को लेकर याचिका दायर हुई जिसके बाद कोर्ट ने वजूखाने तक एंट्री रोकने और ‘शिवलिंग’ को सुरक्षित करने का प्रशासन को निर्देश दिया है। अब काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट अदालत का फैसला आने तक ज्ञानवापी मस्जिद में मिले ‘शिवलिंग’ को सौंपने की मांग कर रहा है ताकि पूजा के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के हवाले कर दिया जाए।

मुस्लिम पक्ष ने इसे फव्वारा बताया और दावा किया कि कुछ साल पहले तक इसका इस्तेमाल किया जाता था। शिवलिंग को लेकर दावे के साथ ही लोअर कोर्ट-हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तीनों जगह इस मामले को लेकर बहस तेज हो गई। सियासी प्रतिक्रियाएं आने लगीं और गलियों -चौक-चौराहों पर ये मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया।

क्या कहता है इतिहास?

काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी मस्जिद का मामला साल 1991 से कोर्ट में है। इससे पहले भी अंग्रेजी काल से ही ये मामला कई बार अदालतों में पहुंचता रहा। काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास कई शताब्दी पुराना है। भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से विश्वेश्वर या विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग सबसे प्रसिद्ध है क्योंकि इसे दुनिया के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है।

काशी विश्वनाथ के प्राचीन मंदिर का सबसे पहला उल्लेख पुराणों में मिलता है। इतिहासकारों के मुताबिक इसे सन 1194 में मुहम्मद गोरी ने तोड़ा जिसके बादा इसे दोबारा बनवाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान ने तोड़वा दिया। यह बार-बा टूटा और बना।

साल 1585 में पुरानी जगह पर आखिरी बार अकबर के सेनापति राजा मान सिंह और वित्त मंत्री राजा टोडर मल द्वारा इस मंदिर को बनवाया गया। लेकिन औरंगजेब के काल में इसे तोड़कर वहां मस्जिद बनवा दिया गया। जिसे ज्ञानवापी या आलमगीर मस्जिद के नाम से जाना जाता है। काशी विश्वनाथ के जिस भव्य मंदिर को आज दुनिया देख रही है उसका निर्माण 1777 में इंदौर की मराठा शासक रानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा करवाया गया था।

क्या कहती है कैलाशनाथ काटजू की किताब?

स्वतंत्रता सेनानी और सुप्रसिद्ध वकील कैलाशनाथ काटजू जिन्होंने 1930 के दशक में काशी विश्वनाथ मंदिर प्रबंधन से जुड़ा केस लड़ा था वह अपनी किताब में लिखते हैं- ‘बनारस के मंदिर सारे संसार में प्रसिद्ध हैं। हिंदू धर्म के प्राय सभी देवताओं के भक्त बनारस में पाए पाए जाते हैं और उन देवताओं की पूजा के विशेष रूप से बनाए मंदिर भी है। किन्तु बनारस भगवान शंकर की निवास-भूमि है।

जिनकी पूजा काशी विश्वनाथ के नाम  की जाती है जो काशी के संरक्षक देवता माने जाते हैं। वर्तमान सुवर्णमंदिर कारीगरी की दृष्टि से कोई भव्य इमारत नहीं है। यह इन्दौर की सुप्रसिद्ध महारानी अहिल्याबाई द्वारा बनवाया गया था। उसके पचास वर्ष बाद पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने गुम्बज पर सोने का पत्तर चढ़वाया। इसी से अब यह सुवर्णमंदिर भी कहलाता है।

कैलाशनाथ काटजू आगे लिखते हैं- ‘इसके निकट ही पुराने मंदिर की जगह थी। वह एक विस्तृत वर्गाकार भूमि है जहां बार-बार उपद्रव होते रहे हैं। मैंने अपने पेशे के सिलसिले में सन 1810 से इस भूमि संबंधी कागजपत्र, कार्रवाइयों और आदेशों के पत्र देखे हैं।

वहां पर कई बार दंगे हुए हैं तथा अन्य प्रकार के झगड़े  भी, दीवानी और फौजदारी होते रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसी वर्गाकार भूमि में प्राचीन काल में काशी विश्वनाथ का विशाल मंदिर बना हुआ था। ऐतिहासिक तथ्यों से मालूम होता है कि यह मंदिर मुस्लिम शासकों के हुक्म से कई बार गिरा दिया गया और हिंदुओं द्वारा फिर-फिर बनवाया गया।

किताब में काटजू ने आगे  लिखा है- ‘दीवानी मुकदमे के सिलसिले में बनारस की जिला अदालत ने इस समग्र विषय की न्यायिक दृष्टि से छानबीन कराई थी। अन्तिम बार जब वह अपनी पुरानी जगह पर बनवाया गया तब अगर मैं भूल नहीं कर रहा हूं तो अकबर का शासन चल रहा था।

सन 1660 के करीब औरंगजेब के हुक्म से वह पुनः गिरा दिया गया और मंदिर की जगह पर एक मस्जिद बनवा दी गई। मस्जिद के पास ही ज्ञानवापी का कुआं है जिसमें कहा जाता है कि शिवजी की मूर्ति पुरोहितों द्वारा उस समय फेंक दी गई थी जब मंदिर अपवित्र कर दिया गया था।’

इसी पुस्तक में एक जगह लिखा गया है- ‘बनारस के न्यायाधीश को अखण्डनीय ऐतिहासिक सामग्री केआधार पर यह मालूम करने में कोई कठिनाई नहीं हुई कि मथुरा के विख्यात केशवदेव मंदिर और बनारस के विश्वनाथ मंदिर को गिरा देने का हुक्म सन 1660 के आसपास दिया गया था।’

औरंगजेब का फरमान

पर्सियन स्कॉलर प्रोफेसर आरिफ अय्यूबी कहते हैं- ‘मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का फरमान जारी किया था। किताब ‘मासिर ए आलमगिरी’ में लिखा है कि औरंगजेब ने 8 अप्रैल 1669 को काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का फरमान दिया था और 5 महीने बाद 2 सितम्बर 1669 को औरंगजेब को ये सूचना दी गई कि विश्वनाथ मंदिर को तोड़ दिया गया है।

मासिर ए आलमगिरी का अनुवाद इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने भी किया है। कोलकाता की ‘एशियाटिक सोसाइटी’ में इसकी मूल पांडुलिपि है। जिसमें कथित तौर पर औरंगजेब को इस बात की सूचना दी गई है कि मंदिर को तोड़ा गया। फारसी के जानकार के जरिए इसका अनुवाद कर हमने समझने की कोशिश की।’

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