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दिल्ली की दिलेर पुलिसवाली हैं सीमा ढाका, 75 दिन 76 गुमशुदा बच्चों को खोजकर लौटा दी खुशियां

कभी यूपी के शामली की शर्मीली लड़की के रूप में जानी जाने वाली सीमा ढाका आज दिल्ली पुलिस की दिलेर पुलिसवाली हैं। उनके साहस से अपराधी थरथर कांपते हैं। दिल्ली पुलिस ने जब उन्हें गुमशुदा बच्चों को ढूंढने का काम दिया तो उन्होंने 75 दिन में 76 बच्चों को खोजकर उनके माता-पिता से मिला दिया, जिसके बाद उन परिवारों में खुशियां लौट आईं।

बच्चों की खुशियां लौटाईं

33 साल की सीमा ढाका पर आज दिल्ली पुलिस को गर्व है। बादली थाने मे तैनात सीमा ढाका बताती हैं कि पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने नाबालिग गुमशुदा बच्चों को ढूंढने पर जोर दिया तो उन्हें लगा कि वह इस काम को बखूबी अंजाम दे सकती हैं। लिहाजा एसएचओ बादली आशीष कुमार दुबे के सामने उन्होंने यह इच्छा जाहिर की। क्राइम ब्रांच के तेज-तर्रार जांच अफसरों में शुमार रहे दुबे ने आला अफसरों से हरी झंडी लेकर सीमा को यह काम सौंप दिया। इसके लिए बाकायदा उन्हें एक टीम भी दे दी। सीमा ने दिन-रात मेहनत कर 75 दिन में 76 गुमशुदा बच्चों को खोज उनके परिजनों से मिला दिया। इनमें 56 बच्चे 14 साल से कम उम्र के थे।

आउट ऑफ टर्म प्रमोशन

गुमशुदा बच्चों को ढूंढने के लिए कमिश्नर की तरफ से 5 अगस्त को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन की स्कीम आने के बाद उन्हें खुद पर कैसे विश्वास हुआ कि वह इस काम को बखूबी अंजाम दे सकती हैं। सीमा कहती हैं कि 2014 में हेड कॉन्स्टेबल बनी थीं और 2016 में उनकी तैनाती अमन विहार थाने में थी। इस दौरान वह तफ्तीश करने के गुर सीख रही थीं। इमर्जेंसी ड्यूटी के दौरान एक नाबालिग लड़की को भगाकर ले जाने की कॉल मिली। स्टाफ के साथ वहां पहुंची तो लड़की की बुजुर्ग दादी और माता-पिता फूट-फूटकर रो रहे थे। दादी की हालत खराब हो रही थी। यह मंजर देख वह भीतर तक हिल गईं।

हेड कॉन्स्टेबल होने की वजह से उनका काम केस रजिस्टर्ड कर इसे संबंधित सब इंस्पेक्टर को ट्रांसफर करना था। सीमा बताती हैं कि संयोग से अगले दिन वह एसआई छुट्टी पर थे। लिहाजा एसएचओ को हालात की जानकारी दी तो वह कहने लगे कि उनके आने तक जांच अपने पास ही रख लो। लिहाजा वह घरवालों से मिलने गईं तो दादी कहने लगी कि अगर लड़की नहीं मिली तो वह मर जाएगी। आरोपी लड़का और नाबालिग अलग-अलग धर्म के थे। इसलिए माहौल बिगड़ने का खतरा भी था। इसलिए उन्होंने इनवेस्टिगेशन शुरू कर दी।

लड़के की सीडीआर निकाली तो आखिरी कॉल एक ऑटो वाले की की थी। इसके जरिए लड़के का दूसरा फोन नंबर मिला, जिसके सहारे वह लड़की के परिजनों और एक सिपाही के साथ कानपुर देहात पहुंच गईं। लड़के के गांव पहुंचकर माहौल गर्मा गया, क्योंकि उन्होंने पूछताछ के लिए लड़के की मां को हिरासत में ले लिया था। बहरहाल, उन्होंने लड़के की मां को लड़की के दूसरे धर्म के होने की वजह से बवाल होने की आशंका से अवगत कराकर भरोसे में लिया। लड़की को 24 घंटे में सकुशल बरामद किया और लड़के को भी गांव वालों को गच्चा देकर दिल्ली ले आईं।

सीमा कहती हैं कि इस केस की वजह से उनका खुद पर भरोसा बढ़ गया। इसलिए पुलिस कमिश्नर की तरफ से गुमशुदा बच्चों की खोजने की योजना सामने आई तो उन्होंने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करने में थोड़ी सी भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। वह अपने इस सफर में अपने साथी स्टाफ का भी शुक्रिया करती हैं। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल से जब वह दो गुमशुदा लड़कों को ला रही थीं तो हेड कॉन्स्टेबल मनोज पूरी रात जागकर लड़कों की रखवाली करते रहे।

पुलिस विभाग में परिवार के कई लोग

रोहिणी में रहने वाली सीमा के ससुराल में अधिकतर लोग दिल्ली पुलिस में हैं। पति अनिक ढाका भी हेड कॉन्स्टेबल हैं, जो रोहिणी में तैनात हैं। मूल रूप से बागपत जिले के उनके ससुर भी दिल्ली पुलिस से रिटायर्ड हैं। ससुर के बड़े भाई सब इंस्पेक्टर रहे हैं। एक देवर सब इंस्पेक्टर हैं, जबकि दूसरा देवर पुलिस में ही क्लर्किल में हैं। एक ननद के पति भी सब इंस्पेक्टर हैं। ससुराल का माहौल पूरा पुलिसमय होने से वह काफी सहज हैं। उन्होंने बताया कि सास-ससुर और पति की तरफ से उन्हें पूरा सहयोग मिला। इसलिए आठ साल के बेटे की तरफ से वह निश्चिंत थीं।

बचपन में पिता ने बढ़ाया हौसला

कमिश्नर की तरफ गुमशुदा बच्चों को खोजने वालों को ओटीपी की स्कीम आई तो उनके पति भी इसे अचीव करना चाहते थे। सीमा बताती हैं कि पुरुष पुलिसकर्मी को लड़कियों से तफ्तीश करने में थोड़ी दिक्कत आती हैं। महिला होने के नाते वह बेधड़क किसी से भी पूछताछ कर लेती हैं, इसलिए वह टारगेट भेदने में सफल रहीं। वह याद करती हैं कि जब वह साइकल से कॉलेज जाती थीं तो गांव के लोग कहते थे अकेली लड़की को कहां भेज रहे हैं। दिल्ली पुलिस जॉइन करने के लिए माता-पिता भले ही राजी नहीं थे, लेकिन ट्रेनिंग के लिए पिता खुद दिल्ली छोड़कर गए थे। इसलिए वह उनके योगदान को भी याद करती हैं।

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