२०१०: जब आतंकी को मारने की के कारण उम्रक़ैद की सज़ा दी गयी थी हमारे जवानों को

कश्मीर में भारतीय नेतृत्व की समझ और हमारे वीर सैनिकों की वीरता का परिचय मिल रहा है। भारत की केन्द्र सरकार के नीति नियंता पहली बार कश्मीर और आतंकवाद को लेकर जनता की आलोचना के पात्र नही बन रहे हैं। कुल मिलाकर कश्मीर से निपटने के सरकारी ढंग और सैन्य वीरता को सर्वत्र समर्थन मिल रहा है। ऐसी स्थिति को बहुत ही संतोषजनक और उत्साहप्रद कहा जाएगा। देश का विपक्ष अब समझ गया है कि उसने जेएनयू के कन्हैया को समर्थन देकर कितनी बड़ी भूल की थी? इसलिए वह भी मौन है।

इससे पूर्व की सरकार के समय कश्मीर में हमारे सैनिक बंधे हुए हाथों से आतंकियों के सामने खड़े होते थे, जिससे हमें सैनिक क्षति भी उठानी पड़ती थी और हमारी सेना को अपनी ही भूमि पर अत्यंत अपमानजनक और अशोभनीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था।

 

वो 30 अप्रैल 2010 का समय था!

स्थान था कश्मीर का मच्छिल सेक्टर!

हमारी सेना का कर्नल डी के पठानिया कश्मीर में अपने जवानों की एक एक कर के अपनी आँखों के आगे वीरगति देख रहा था!

उसकी बटालियन के हाथ और पैर दिल्ली में बैठी दुर्दांत आतंकी संगठन कांग्रेस की सरकार ने बाँध रखे थे!

वो बेचैन भारत माँ का लाल हर दिन अपने हाथों से अपने किसी शूरवीर जवान का अंतिम संस्कार कर रहा था, पर दिल्ली में बैठी आतंकी संगठन की सरकार बस एक आदेश देती थी:

जो हो रहा है उसे होने दो! ज्यादा देश भक्ति सवार है क्या? वर्दी से नहीं तो कम से कम अपने परिवार से प्रेम करो और चुप रहो!

एक दिन उस से ना रहा गया!

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30  अप्रैल 2010 को वो महावीर कर्नल पठानिया ने स्वयं को आतंकी संगठन कांग्रेस के हर आदेश, हर बाध्यता, हर नियम से मुक्त कर डाला!

उसके साथ इस पावन अभियान में उसका अधीनस्थ मेजर उपेन्द्र आया! उसके साथ हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी व सिपाही अरुण कुमार भी आये और  कांग्रेस के हर आदेश की धज्जी उड़ाते हुए इन महावीरों ने सेना वो काफिरों को तंग कर चुके शहज़ाद अहमद , रियाज़ अहमद व् मोहम्मद शफ़ी को अपने खुद के नियम और खुद के क़ानून से मार गिराया!

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