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RRR की राम और भीम की असली कहानी: दोनों ने अंग्रेजों और निजामों को छठी का दूध याद करा दिया था

फिल्म RRR बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाए हुए है। यह फिल्म 400 करोड़ की कमाई का आंकड़ा पार कर चुकी है। एसएस राजामौली द्वारा निर्देशित साउथ की फिल्म राईज रोअर रिवॉल्ट (RRR) 25 मार्च को रिलीज हुई है। फिल्म में राम चरण और जूनियर एनटीआर ने प्रमुख भूमिका निभाई है।

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दो वीरों पर आधारित है फिल्म

यह फिल्म रियल लाइफ के दो हीरो पर आधारित बताई जा रही है। इन दोनों वीरों ने ब्रिटिश हुकुमत के दौरान अंग्रेजों और निजाम को नाको-चने चबवा कर उन्हें छठी का दूध याद करा दिया था। इन दोनों का नाम है अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम। निर्देशक राजामौली के मुताबिक प्रसिद्ध क्रांतिकारी अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम की जिंदगी पर आधारित फिल्म RRR को फिक्शनल रूप दिया गया है।

दोनों मिल जाते तो इतिहास कुछ और होता

निर्देशक राजामौली का कहना है कि इन क्रांतिकारियों के जीवन के बारे में बहुत अधिक ज्ञात नहीं है, लेकिन इस काल्पनिक कहानी के जरिए ये दिखाने का प्रयास किया गया है कि उनके जीवन में क्या हुआ था और अगर दोनों एक साथ मिल गए होते तो क्या होता।

अल्लूरी सीताराम राजू कौन थे?

अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 1897 में विशाखापटनम में हुआ था। सीताराम अंग्रेजों के अत्याचारों का दंश देखते हुए बड़े हुए। सीताराम राजू ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया और 1922 से 1924 तक चले राम्पा विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। इससे परेशान होकर अंग्रेजों ने उनके खिलाफ दमन की नीति अपनाई और उन्हें एक पेड़ से बांधकर गोलियों के भून डाला।

कोमाराम भीम कौन थे?

कोमाराम भीम का जन्म 1900 ईस्वी में आदिलाबाद के संकेपल्ली में हुआ था। कोमाराम ने निजाम की बर्बरता झेली। बड़े होने पर कोमाराम ने कुछ आदिवासी साथियों को एकत्र किया और हैदराबाद की आजादी के लिए विद्रोह छेड़ दिया। वो गोरिल्ला युद्ध में माहिर थे। 1928 से लेकर 1940 तक उन्होंने निजाम के सैनिकों का मुंहतोड़ जवाब दिया और अपने लोगों के लिए एक युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

भारत के इतिहास में साउथ के इन दोनों वीरों का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। दोनों ने छोटी उम्र में ही अत्याचार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था और अपने संघर्षों से अंग्रजों और निजाम के दिल में इस बात को अच्छी तरह बिठा दिया था कि अब भोली-भाली जनता पर अत्याचार करना आसान नहीं होगा। 1947 में भारत को मिली आजादी में इन दोनों वीरों ने अपने क्रांतिकारी आंदोलनों से अहम योगदान किया था, जनता इन वीरों के आंदोलन से अंग्रजों के खिलाफ एकजुट हो गई थी।

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