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पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ा दिए, सरकार हिला दी: कर्नल बैंसला के निधन पर यूं ही नहीं रो रहे लोग

गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के नेता रहे कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का गुरुवार सुबह में निधन हो गया। बैंसला कई दिनों से बीमार चल रहे थे। केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी ने गुर्जर नेता के निधन पर शोक जताते हुए ट्वीट किया, ‘कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के निधन का समाचार दुखद है।

समाज सुधार एवं समाज को संगठित करने में आपका योगदान अविस्मरणीय रहेगा।’ विधायक जोगेंद्र सिंह अवाना ने मीडिया से बातचीत में कहा कि बैंसला का निधन गुर्जर समाज और उनके खुद के लिए व्यक्तिगत क्षति है। उन्होंने कहा, ‘हमारे गुर्जर गांधी चले गए, इससे बड़ा दुख गुर्जर समाज के लिए हो नहीं सकता।’

कर्नल बैंसला से जुड़े रहे शैलेंद्र सिंह धाभाई ने इसे गुर्जर समाज के लिए अपूरणीय क्षति करार दिया। उन्होंने कहा, ‘बैंसला ने पिछड़े वर्ग और गुर्जर समाज के लिए चेतना जगाने का काम किया। हमेशा उनके मन में गुर्जर समाज के भले की चिंता रहती थी और वह बहुत ही दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे। यूपी से लेकर राजस्थान तक गुर्जर समुदाय के लाखों लोग कर्नल बैंसला के निधन से दुखी। आंखों में आंसू लिए लाखों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंच रहे हैं।

राजस्थान के करौली में जन्म

राजस्थान के करौली जिले के मुंडिया गांव में बच्चू सिंह बैसला के घर 1939 में किरोड़ी सिंह बैंसला का जन्म हुआ था। मां-पिता ने गांव में ही बैंसला की शुरुआती पढ़ाई करवाई। 12वीं की बोर्ड परीक्षा पास करने के बाद बैंसला ने भरतपुर और जयपुर के महाराजा कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की। इसके बाद वह प्रथम सर्वेश महुआ में अंग्रेजी के प्रफेसर बन गए। दो साल प्रफेसर की नौकरी करने के बाद बैंसला भारतीय सेना में भर्ती हो गए।

1971 की जंग में पाक के छक्के छुड़ाए

उन्होंने 1962 के भारत-चीन और 1965 के भारत-पाकिस्तान का युद्ध लड़ा। किरोड़ी सिंह बैंसला पाकिस्तान में युद्धबंदी भी रहे। अपनी जाबांजी के कारण ही वह सिपाही से कर्नल के पद तक पहुंचे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बैंसला ने युद्ध के मैदान में पाकिस्तानी सैनिकों को छक्के छुड़ा दिए थे। सेना में उनके साथी उन्हें रॉक ऑफ जिब्राल्टर और इंडियन रैम्बो कहते थे।

उनकी एक बेटी अखिल भारतीय सेवा में अधिकारी है, वहीं दो बेटे सेना में हैं, एक बेटा निजी कंपनी में कार्यरत है।1991 में भारतीय सेना से रिटायर होने के बाद जब वह अपने गांव लौटे तो यहां शिक्षा की हालत देखकर द्रवित हो गए। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वह राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में लोगों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करेंगे।

समाज के लिए पत्नी को चुनाव लड़ाया

गांव और समाज के लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए किरोड़ी सिंह बैंसला ने अपनी पत्नी को पंचायत चुनाव में प्रत्याशी बनाया। 1994 में पत्नी ग्राम पंचायत मुड़िया की सरपंच बनी। इसके साथ ही उन्होंने शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना शुरू किया। 1996 में सरपंच पत्नी के निधन के बाद बैंसला के अभियान को धक्का लगा। फौजी की नौकरी कर चुके किरोड़ी सिंह बैंसला ने हिम्मत नहीं हारी और नए सिरे से राजस्थान में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जुट गए।

गुर्जर आंदोलन की कमान संभाली

2005 में उन्हें गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति का संयोजक बनाया गया। इस दौरान उन्होंने गुर्जर समाज को न केवल विश्व के मानचित्र पर प्रदर्शित किया बल्कि राजस्थान में गुर्जरों को आरक्षण दिलवाने की मुहिम को तेज किया। गूजरों के एसटी में शामिल कराने के मांग को लेकर कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में साल 2008 में हुए गुर्जर आरक्षण में 70 लोगों की जान चली गई थी।

राजस्थान की सरकार हिल गई

किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में जारी आंदोलन के चलते राजस्थान सरकार को झुकना पड़ा। आखिरकार राजस्थान के गुर्जरों को विशेष पिछड़ा वर्ग का 5 फीसदी आरक्षण मिला। कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला गुर्जर समाज मैं शिक्षा को लेकर जन जागरण का कार्य करते रहे। उन्होंने ‘गुड हेल्थ, गुड एजुकेशन’ का नारा देकर गांवो में अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने पर जागृति पैदा करने का कार्य निरंतर रूप से करते रहे। आंदोलन के दौरान राजस्थान की वसुंधरा सरकार की काफी किरकिरी हुई और विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था।

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