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राजकुमारियों के साथ जाने वाली दासियां क्या करती थी, हिंदू और मुस्लिम राजघराने में थी अलग प्रथा

आज के आधुनिक समाज में पूरी दुनिया में सक्रिय राजवंश बहुत कम बचे हैं। लेकिन आज भी दुनिया के कई देशों में राजसत्ता चलती है और वहां उन्ही पुरानी परंपराओं को निभाया जाता है, जिसमें कई अरब देश भी शामिल हैं। यही नहीं उत्तर कोरिया के किम जोंग जैसे तानाशाहों के शासन में भी राजसत्ता वाले चरित्र को आसानी से देखा जा सकता है।

दास-दासियों को रखने की परंपरा

दुनिया के सभी राजवंशों में राजपरिवार की सेवा के लिए, उनका मनोरंजन करने के लिए या उनके साथ हमेशा रहने के लिए दास-दासियों की व्यवस्था रहती थी। इन शासकों, राजा, महाराजाओं, नवाबों, बादशाह और शहंशाहों के पास दासियों की बड़ी संख्या होती थी|

इन दासों के द्वारा राज्य के प्रतिदिन के दिनचर्या के कार्य कार्यान्वित किये जाते थे, जब भी कोई राजा किसी दूसरे राज्य पर हमला करके उसे हरा देता था तो उस राज्य के सभी संपत्ति पर उसका अधिकार हो जाता था, महल की बेशकीमती चीजें विजयी राजा के राजमहल में भेज दी जाती थीं जैसे कोहिनूर हीरा को अलाउद्दीन खिलजी ने गोलकुंडा से प्राप्त किया था जो ब्रिटिश राज में लंदन पहुंच गया।

हिंदू राजाओं की ऐसी थी परंपरा

युद्ध में हारे हुए राजपरिवार के पुरुष सदस्यों को हिन्दू राजा छोड़ देते थे या कारागार में डाल देते थे और रानी और उसकी दासियों को अपने हरम महल में रख देते थे। हिंदू रानियों के साथ रहने वाली दासियों की हालत काफी अच्छी होती थी और उनपर बहुत कम अत्याचार होते थे।

मुस्लिम सुल्तानों की ऐसी थी परंपरा

मुस्लिम सुलतान हारे हुए पुरुष राजपरिवार के सदस्यों को जनता के सामने इतनी दर्दनाक मौत मारते थे की देखने वाले की रूह काँप जाये। बलबन और अलाउद्दीन खिलजी ने जाटों को युद्ध में हराकर उनके सिरों को काटकर 20-30 फिट ऊंची दीवारें बनवायी थीं।|

फिर राजपरिवार की दासियों से लेकर महारानी तक को राजदरबार में सुल्तान के फरमान से बुलाया जाता था , महारानी और राजकुमारियों को सुल्तान की सेवा में लगा दिया जाता था और शेष दासियों को घुड़सवारों, पैदल सेना में बाँट दिया जाता था।

हिंदू महिलाओं की बोली लगाते थे

जब गुलाम बनाई गईं हिन्दू स्त्रियों की शारीरिक दशा ख़राब हो जाती थी तो उन्हें बाजारों में हथकड़ी लगाकर अर्धनग्न करके उनकी बोली लगवाई जाती थी। इसके बाद कई जगह जौहर प्रथा का आरम्भ हुआ जिसमें हारे हुए हिन्दू राजपरिवार की स्त्रियां आग में कूद कर गुलाम बनने से पहले ही जान दे देती थीं।

राजपरिवार की स्त्रियों संग रहती थीं दासियां

हिन्दू और मुस्लिम राजा महल की स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था महल में ही करवाते थे। रानी और राजकुमारी के साथ जो दासियाँ लगाई जातीं थी वह अत्यंत सुशिक्षित, युद्ध कला में निपुण,सुन्दर होती थीं, ताकि राजकुमारियों पर अच्छा प्रभाव पड़े।

राजकुमारियों के साथ जाती थीं दासियां

विवाह के बाद राजकुमारी के साथ बहादुर, बुद्धिमान एक या दो दासियों को भेजा जाता था जो राजकुमारी के जीवन की रक्षा कर सकें। क्योंकि राजपरिवार में षड्यंत्र बहुत रचे जाते थे। इन दासियों का कार्य राजकुमारी को शासन के कार्यों से सम्बन्धी सूचनाएं देना होता था और उनका पुत्र उत्तराधिकार प्राप्त करेगा या नहीं इसका ध्यान रखना होता था। इन दासियों को आजीवन अविवाहित रहना होता था और अपनी राजकमारी- महारानी और उनके पुत्रों के जीवन की रक्षा करना होता था। पन्ना धाय और मंथरा प्रमुख हितैषी दासियाँ थीं।|

अकबर के शासनकाल में हरम में रानियों की संख्या 5000, उनके सेनापति मानसिंह के हरम महल में 1500 स्त्रियां थीं। अकबर के हरम में 10000 दासियाँ सेवा में लगाई गयी थीं। जोधाबाई, अकबर की प्रमुख महारानी थीं।

 

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