दिलचस्प

बहुत अनूठी है बाबा बैद्यनाथ धाम की होली, हरि और हर के अद्भुत मिलन के बाद ही उड़ते हैं रंग-गुलाल

मथुरा, वृंदावन, काशी की तरह ही बाबा बैद्यनाथ धाम देवघर की होली भी काफी अनूठी और मशहूर है। देश के 12 ज्योतिर्लिंग में एक बाबा बैद्यनाथ का धाम देवघर भी है। बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग दरबार की होली बेहद अनूठी है।

यह भारतीय संस्कृति का अलौकिक प्रतिबिंब है। यह वह स्थान है जहां हरि और हर ही नहीं, शिव और शक्ति का मिलन हुआ था। आपको बता दें कि यहां हरि और हर के मिलन के बाद ही मंदिर प्रांगण में भक्त होली खेलने में सराबोर हो जाते हैं और पूरे देवघर में होली मनाई जाती है।

ये है पौराणिक कथा

देवघर के शिवलिंग को रावणेश्वर बैद्यनाथ कहा जाता है। लंकापति रावण के कारण बाबा देवघर आए। बैद्यनाथ मंदिर के पुरोहित श्रीनाथ महाराज कहते हैं कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेता काल में लंकापति रावण कैलाश पर्वत से शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था।

ताकि भोलेनाथ को वहां स्थापित कर सके। देवताओं को यह नहीं भाया। बस उनके मायाजाल में रावण घिर गया। लंका तक शिवलिंग नहीं ले जा सका। दरअसल, शंकर भगवान ने शर्त रखी थी कि बिना कहीं रुके शिवलिंग को लंका ले जाओ, कहीं रख दिया तो वहीं विराजमान हो जाएंगे।

रावण शिवलिंग लेकर चला, मगर जब देवघर से गुजर रहा था तभी उसे लघुशंका लगी। जमीन पर वह शिवलिंग नहीं रख सकता था। तभी चरवाहे के रूप में भगवान विष्णु वहां आए। उसने उनको शिवलिंग सौंपा और लघुशंका करने चला गया। हरि के हाथ हर यानि शंकर को दिया गया था, दोनों का यहां मिलन हुआ। उसी समय भगवान विष्णु ने देवघर में अवस्थित सती के हृदय पर शिवलिंग स्थापित कर दिया। वह चैत्र प्रतिपदा का समय था।

बस वह परंपरा चल पड़ी। आज भी निभाई जा रही है। भगवान विष्णु की मूर्ति को शिवलिंग पर रख मंदिर के पुजारी उन दोनों को अबीर लगाते हैं। उसके बाद भक्त अबीर और गुलाल उड़ाकर होली खेलने लगते हैं। जी हां, देवघरवासी बाबा को अबीर अर्पित करके ही एक दूसरे को अबीर लगाते हैं।

हरि झूलते हैं झूला

तीर्थपुरोहित दुर्लभ मिश्र बताते हैं यहां से जुड़ी एक परंपरा और है। हरि और हर के मिलन से पहले मंदिर परिसर में बने राधा कृष्ण मंदिर से हरि को पालकी पर बिठा कर शहर के आजाद चौक स्थित दोलमंच ले जाया जाता है। वहां बाबा मंदिर के भंडारी उनको झूले पर झुलाते हैं। देवघरवासियों को भी उनको झुलाने का मौका मिलता है। होलिका दहन के पश्चात भगवान को पालकी पर बिठा कर बड़ा बाजार होते हुए पश्चिम द्वार से मंदिर लाया जाता है। उसके बाद कृष्ण और बाबा बैद्यनाथ का मिलन होता है। उसके बाद होली का रंग खेलना शुरू हो जाता है।

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