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सिर्फ पीएम मोदी ही नहीं, इन 10 कारणों से मिला बीजेपी को प्रचंड बहुमत!

वैसे तो बीजेपी के नेता दावा कर रहे थे बहुमत का लेकिन शायद उनको भी ये उम्मीद नहीं रही होगी कि इतनी भारी जीत मिलेगी. कोई भी भाजपाई सर्वे आने के बाद भी 250 सीटों से आगे नहीं बढ़ रहा था. यूपी का नक्शा पूरा भगवा हो गया है औऱ ऐसे में हरा और नीला रंग नदारद दिख रहा है. जाहिर सी बात है बीजेपी इस जीत से खासी उत्साहित हैं. अब इसे मोदी की लहर कहें या हिंदुत्व कार्ड का सफल होना, बीजेपी ने सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 300 से अधिक सीट जीतकर पूर्ण बहुमत पा लिया है. बीजेपी की इस भारी जीत के पीछे पीएम मोदी के धुआंधार प्रचार, उनके कामकाज पर भरोसे समेत तमाम कारणों को माना जा रहा है. जानें, बीजेपी की इस प्रचंड जीत के पीछे क्या हैं 10 महत्वपूर्ण कारण-

1- मोदी लहर-

उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि वहां 2014 में शुरू हुई मोदी लहर अभी तक थमी नहीं है. बीजेपी की इस जीत की सबसे बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही रहे. जनता ने एक बार फिर मोदी के साथ खड़े होने का फैसला किया. 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी और सहयोगी अपना दल ने यूपी में 80 में से 73 सीटें जीतकर लहर का पहला परिणाम देखा था.

2- ऩोटबंदी बना ट्रंप कार्ड-

बीजेपी की जीत में नोटबंदी ने काफी मदद की. जहां विपक्षियों का मानना था कि नोटबंदी पर जनता नाराज है लेकिन जनता ने नोटबंदी पर अपनी मुहर लगा दी. जनता ने दिखा दिया कि वह कालाधन वालों के खिलाफ मोदी के उठाए कदमों का समर्थऩ करती है.

3- सीएम पद का चेहरा ना देना-

एक खास रणनीति के तहत बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं घोषित किया और मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा औऱ बीजेपी का ये दांव काम कर गया. प्रचार पूरी तरह से मोदी पर फोकस्ड रहा. पार्टी ने उनकी विकास की इमेज का पूरा फायदा उठाया. उनके भाषणों ने जनता को बीजेपी के प्रति आकर्षित करने का काम किया.

4- सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन-

यही नहीं पाकिस्तान के खिलाफ की गयी सर्जिकल स्ट्राइक भी जनता को रास आई और जनता को यह पसंद नहीं आया कि देश के दुश्मनों के खिलाफ कार्रवाई पर कोई सवाल खड़े किये जाएं.

5- बाहरी मगर जिताऊ नेताओं पर ज्यादा जोर-

बीजेपी ने कई जगह कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोल ली और बाहर से आए जिताऊ नेताओं पर भी दांव लगाया. कार्यकर्ताओं के विरोध पर कहा था कि हमने कैंडिडेट्स की विश्वसनीयता और उनकी जीतने की क्षमता के आधार पर टिकट बांटे हैं. इसी तर्क को देखते हुए पार्टी ने राजनीतिक परिवार के लोगों को खूब टिकट बांटे. बीजेपी का यह तर्क काम करता भी दिखा है. बाहर से पार्टी में आए अधिकतर नेताओं को बीजेपी के टिकट पर जीत मिली है.

6- ओबीसी केशव प्रसाद मौर्य को अध्यक्ष बनाना-

भारतीय जनता पार्टी को अगड़ों की पार्टी माना जाता है लेकिन इस चुनाव में उसने पिछड़ों को अगुवा बनाया. केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाना इसी कड़ी में एक बड़ा कदम था. इसके अलावा टिकट बंटवारे में भी पिछड़ों का पूरा ध्यान रखा गया. पीएम मोदी भी खुद के ओबीसी होने को समय-समय पर भुनाते रहते हैं. ओबीसी की तमाम जातियों ने बीजेपी की ओर रुख किया. साथ ही गैर जाटव दलित वोट भी बीजेपी के साथ खड़ा हुआ.

7- हिंदुत्व-

मोदी लहर और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग प्रदेश के इन चुनावों में इतनी कारगर नहीं होती अगर बीजेपी अपने हिंदू कार्ड का इतना सधा हुआ इस्तेमाल न करती. क्योंकि बीजेपी के लिए किसी भी उस सीट को जीतना मुश्किल हो जाता जहां बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटर मौजूद हैं. मोदी का कब्रिस्तान और श्मशान वाला बयान भी सही समय पर आया और इसका सीधा प्रभाव भी देखने को मिला.

8- पिछड़ों और दलितों का साथ-

बीजेपी ने मुस्ल‍िमों को लुभाने के लिए सपा-कांग्रेस अलायंस या बसपा जैसी स्ट्रैटजी नहीं अपनाई. उसने शहरी इलाकों पर फोकस किया. मोदी के विकास के एजेंडे को भी भुनाया. अमित शाह ने अपने निशाने पर समाजवादी पार्टी के खेमे से गैर-यादव और बहुजन समाज पार्टी से गैर-जाटव वोट पर नजर रखते हुए अपने कैंडिडेट मैदान में उतारे. इसके चलते ही बीजेपी ने 150 सीट से गैर-यादव ओबीसी उम्मीदवार उतारे. वहीं अपना दल और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन से पार्टी ने पटेल, कुर्मी और राजभर वोटों को अपनी ओर खींचने में सफलता पाई.

9- उज्ज्वला योजना की मदद-

बीजेपी की कुछ योजनाएं भी जनता को खींचनें में कामयाब हीं. इनमें उज्ज्वला योजना सबसे आगे रही. इय योजना की शुरुआत भी उत्तर प्रदेश के बलिया से ही हुई थी. अब तक करीब 1 करोड़ गैस कनेक्शऩ उज्ज्वला योजना के तहत बांटे गये. इनमें से सबसे ज्यादा कनेक्शन उत्तर प्रदेश में ही बांटे गये.

10- समाजवादी पार्टी में लड़ाई-

विधानसभा चुनाव से ऐन पहले समाजवादी पार्टी की पारिवारिक फूट का भी बीजेपी की जीत में योगदान रहा. लोगों में अखिलेश के खिलाफ संदेश गया कि उन्होंने अपने पिता और चाचा को ही पार्टी से दरकिनार कर दिया. इसके अलावा कांग्रेस से गठबंधन भी शायद जनता को रास नहीं आया.

बीजेपी को प्रचंड बहुंत मिला है. जनता ने बीजेपी में भरोसा जताया है ऐसे में उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गयी हैं.

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