शिवसेना का यूटर्न: मुस्लिम को 5% आरक्षण और सावरकर को भारत रत्न की मांग छोड़ने पर हुई राज़ी

महाराष्ट्र की राजनितिक कुर्सी पर कब्ज़ा ज़माने के लिए पिछले कुछ समय से बहुत हाई वोल्टेज ड्रामा चल रहा हैं. अब इसी कड़ी में एक नया ट्विस्ट सामने आया हैं. जहाँ एक तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आरोप हैं कि शिवसेना ने उनके साथ गठबंधन ख़त्म किया हैं तो वहीं दूसरी ओर बीते गुरुवार शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिलकर अपनी सरकार बनाने के संकेत दे डाले. हुआ ये कि गुरुवार के दिन शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर एक संयुक्त बैठक की. ये बैठक न्यूनतम साझा कार्यक्रम को लेकर थी जिसके अंतर्गत सभी पार्टियाँ कुछ मतों पर अपनी सहमती देने की हामी भरती. अब यदि इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में रखी गई शर्तों पर यदि तीनों पार्टी आपसी सहमती दे देती हैं तो महारष्ट्र में इन तीनो पार्टी के नेतृत्व में गठबंधन वाली नई सरकार जन्म लेगी.

ख़बरों की माने तो इस मीटिंग में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के कहने पर मुस्लिम समुदाय को शिक्षा के क्षेत्र में 5 प्रतिशत का आरक्षण देने के लिए राज़ी हो गई हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि ये योजना पहले पूर्ववर्ती कांग्रेस और एनसीपी सरकार के कार्यकाल में स्टार्ट की गई थी. हालाँकि जब सरकार बदली थी तो इसे लागू नहीं किया जा सका था. अब यदि शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिल अपनी गठबंधन वाली सरकार बना लेती हैं तो इस योजना को पुनः लागू कर दिया जाएगा.

इतना ही नहीं इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में वीर सावरकर को भारत रत्न ना देने की मांग भी रखी गई हैं. ऐसे में शिवसेना इसक यूपर भी अपनी सहमती दे सकती हैं.इनके अलावा किसानों का लोन माफ करना, 10 रुपए में खाना, बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता, नई इंडस्ट्री में स्थानीय युवाओं का नौकरी के लिए कोटा जैसी शर्ते भी न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल हो सकती हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि ये सभी चीजों के वादें कांग्रेस और एनसीपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र के दौरान किये थे. ऐसे में वे इन चीजों के लिए भी शिवसेना को राज़ी कर सकती हैं. अब 17 या 18 नवंबर को एनसीपी प्रमुख शरद पवार कांग्रेश अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिल्ली में मुलाकात कर सकते हैं. इस दौरान इनकी शिवसेना के साथ जो गठबंधन होना हैं उस पर चर्चा होगी. इसके साथ ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी सोनिया गांधी से मिल सकते हैं.

गौरतलब हैं कि महारष्ट्र के चुनाव भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन बनाकर लड़ें थे. ऐसे में इन दोनों पार्टियों को बहुमत मिलने के कारण इनकी गठबंधन वाली सरकार बनाई जा सकती थी. हालाँकि महारष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद को लेकर दोनों पार्टियों में मतभेद हो गए थे. शिवसेना चाहती थी कि ढाई-ढाई साल के लिए सीएम पद पर दोनों पार्टियों का हक़ रहे लेकिन बीजेपी को ये बात मंजूर नहीं थी. ऐसे में शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया और अब वे एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर अपनी गठबंधन वाली सरकार बनाने की फिराक में हैं. वहीं दूसरी तरफ सभी पार्टियाँ अपने स्पष्ट आकड़ें पेश करने में विफल रही तो महाराष्ट्र में फिलहाल राष्ट्रपति शासन लागू हैं.