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विडियो देखिये: इस महान योद्धा ने कैसे ‘दर्दनाक मौत’ और ‘इस्लाम’ में से ‘मौत’ को चुना :

भारत में हिंदवी स्वराज एवं हिन्दू पातशाही की गौरवपूर्ण स्थापना करने वाले छत्रपति  शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज के जीवन को यदि चार पंक्तियों में संजोया जाए तो
यही कहा जाएगा कि:-

‘देश धरम पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।।’

 

https://www.youtube.com/watch?v=k5v6GQ7ofWA

”होनहार विरवान के होत चीकने पात’ जैसी चरितार्थ कथा यथार्थ यदि देखना हो तो  छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी को देखा जा सकता है धरती पर कदम रखते ही संघर्षो का जिसका साथ रहा हो जिसने ५-६ वर्ष की आयु से ही पिता के कंधे से कन्धा मिलाकर संघर्ष किया हो, जिसके पास हिन्दू पद्पाद्शाही से क्षत्रपति तक का अनुभव रहा हो, जिसने शिवा जी राजे की संघर्ष शील छत्र क्षाया में प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, ऐसे संभा जी के ऊपर उनके अष्ट प्रधानो द्वारा ही अपने निजी स्वार्थ के कारन उन्हें लांछित करने का प्रयास किया जा रहा हो, एक तरफ औरंगजेब की पांच लाख की सेना का आक्रमण तो दूसरी तरफ साम्राज्य की अंतर कलह ऐसी विकट परिस्थिति में जिस महापुरुष ने २२ वर्ष की अल्प आयु में क्षत्रपति जैसे दायित्व का भार सुशोभित किया जिसने नौ वर्षो तक सफलता पूर्वक शासन ही नहीं किया बल्कि हिन्दवी साम्राज्य का विस्तार भी किया ऐसे महान देश भक्त धर्मवीर सम्भाजी राजे ही हो सकते है संभा जी का जन्म १६५७ में हुआ आठ वर्ष की आयु में पिता की आज्ञा से मुग़ल दरबार में पांच हजारी लेकर राजा की उपाधि ग्रहण की लेकिन वे तो हिन्दवी स्वराज्य संस्थापक शिवा जी महाराज के पुत्र थे उन्हें यह नौकरी बर्दास्त नहीं थी, लेकिन पिता की आज्ञा मानकर मराठा सेना के साथ छह वर्षो तक औरंगजेब के यहाँ रहे १४ साल की आयु में उन्होंने तीन ग्रंथ संस्कृति मे लिखे वे कितने मेधावी थे इससे यह पता चलता है।

पेज न. २ पर देखिये एक और विडियो और आगे का किस्सा

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