रावण वध के पश्चात जब सुपर्णखा सीता जी से बन में मिली और पूछा कैसे लग रहा है तुम्हे पति बियोग?

वाल्मीकि रामायण या अन्य रामायण में रावण वध के बाद कहीं भी सुपर्णखा का कोई प्रसंग का वर्णन नहीं है, पर एक अन्य ग्रन्थ में वर्णन है की सुपर्णखा रावण वध के बाद कोई आश्रम में चली गयी थी और वहां वो भगवान् के बिषय में चिंतन करने लगी.

वैसे सुपर्णखा भगवान् के रूप पर कई जन्म पीछे से थी. एक दिन वो किसी मुनि के आश्रम के नजदीक भ्रमण कर रही थी. उसने मुनि से पूछा की क्या आप लोगो ने कभी भगवान को देखा भी है, या ऐसे ही ॐ- ॐ का जाप और योग क्रिया में व्यस्त रहते हो? मुनि ने सुपर्नख को डांटा और कहा की हाँ मैंने भगवान् को देखा है. वो तो प्रेम और भक्ति से मिलते हैं.

सुपर्णखा ने मुनि से कहा की क्या मुझे भी भगवान् दिख सकते है? मुनि ने कहा की बिलकुल- अभी उन्हें दर्शन का समय तुम्हारे सम्मुख उपष्टित हो गया है. मुनि ने कहा की भगवान् तो तुम्हे अभी जंगल में दण्डक वन में मिल जायेंगे, और तुम्हे उनका दर्शन होगा, पर तुम उन्हें देखने के बाद उनसे उनकी भक्ति मांगना

सुपर्णखा ने मुनि की बात सुनी तो अबश्य पर उसे गंभीरता से नहीं लिया और वो दण्डक वन में उड़ने लगी. अचानक उसने एक कुटिया देखा और उसे भगवन श्री राम का दर्शन उसे हुआ. सुपर्णखा ऐसे मनमोहक रूप देखकर व्याकुल हो गयी, पर वो मुनि की बाते भूल गयी की वो भगवान् ही हो सकते है- कोई साधारण मानव नहीं? इस प्रकार भगवान् के दर्शन के पश्चात भी वो उनसे प्रणय निबेदन किया और भक्ति मांगना तो बो भूल ही गयी. आगे की कथा आपको पता है.

इस प्रकार रावण वध के पश्चात सुपर्णखा श्री राम से मिलना चाहती थी, पर वो किसी कारण वश उनसे नहीं मिल सकी.

सुपर्णखा को मुनियो ने बताया की श्री राम कोई साधारण मानव नहीं बल्कि स्वयं भगवान् हैं, और तुम्हे उन्ही का चिंतन हमेशा करने चाहिए. वैसे भी सुपर्णखा अकेली थी और उसके पति का अंत उसी के भाई रावण के द्वारा गलती से कर दिया गया था. इस प्रकार वो अकेली एक दिन सुपर्णखा ने सुना की सीता जी को वन में अकेली रहती है और वो किसी वाल्मीकि मुनि के आश्रम में है. सीता जी से मिलने सुपर्णखा पहुंची और अकेले में सीता जी से मिली. माता सीता ने सुपर्णखा को यहाँ देखकर हैरान हुई, पर फिर हाल समाचार पूछा.

सुपर्णखा ने सीता जी को उनका मजाक उड़ाये और कहा की तुम्हारे कारण श्री राम ने मुझे कुरूप करा दिया था और आज उन्ही से अलग आज तुम वन में अकेली रहती हो? अब कैसा लगता है वियोग? माता सीता सुपर्णखा की बाते सुनकर हैरान नहीं हुई और उन्हें मीठे बैर खाने को दिए जो उन्हें वाटिका में मिला था.

सुपर्णखा को माता सीता ने सुझाव दिया और समझाया की तुम अपने कर्म के अनुसार आज अकेली रहती हो क्योंकि वही रावण तुम्हारे भाई के कारण तुम्हारे पति की मृत्यु हो गयी और मैं भी अपने कर्म के बैश ही आज वन में हूँ,पर मैं परेशांन नहीं हूँ. हर प्राणी अपने किये कर्म के अनुसार ही सुख- दुःख भोगता है और इसमें भगवान या विधाता कोई मायने नहीं रखता? सीता माता ने कहा की सुपर्णखा तुम रावण के जैसे न बनो, क्योंकि तुमने अपने भाई को देखा है की किस प्रकार उसका सारा राज्य बैभव, धन, परिवार, पुत्र भाई और फिर स्वयं कैसे अंत को प्राप्त हुआ?

तुम प्रकृति से प्यार करो और मैं भी प्रकृति के अंदर रहती हूँ और प्रकृति की छटा देखने वन में रहती हूँ. तुम्हे जिन्होंने कुरूप किया था, वो उस समय के बाद से स्वयं शांत नहीं बैठ सके- इस बात को ध्यान करो. वैसे कुरूप उन्होंने तुम्हे ऐसे ही नहीं किया, क्योंकि, तुमने मांग ही उन प्रभु से गलत किया था? अब बापिस जाओ और उन्हें ध्यान करती रहो- वो कृपालु है, इसलिए वो कृपा करेंगे

इस प्रकार सुपर्णखा बापिस चली गयी और वही सुपर्णखा द्वापर युग में कंश की चन्दन लेप करने बाली कुवड़ी हुई, जिसे श्री कृष्ण(श्री राम) ने कुवड़ समाप्त कर अपनी प्रेमिका बना लिया. कुवड़ी को अति सुन्दर रूप देकर उसे वो सारे बाते बतायें, की कैसे उन्हें श्री राम मिले थे और वो तभी से उन्ही का ध्यान कर रही है.