अपनी मन्नत पूरी करने के लिए इस गांव को लोग निभाते हैं ये अजीबो-गरीब रिवाज

न्यूज़ट्रेंड वेब डेस्क: “परंपरा” एक ऐसा शब्द जो सालों से चलता आ रहा है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अपनाते हैं और इसे आगे बढ़ाते जाते हैं। यह परंपरा क्यों हैं इसके पीछे क्या तत्व है इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं होता है, किसी को यह मतलब नहीं होता है कि सालों से चली आ रही यह परंपरा सही है या गलत। उस परंपरा को करने के पीछे का कोई लॉजिक है या नहीं कोई भी इस बारे में नहीं सोचता बस आंखे बंद करके सालों से चली आ रही परंपराओं को चलाते आ रहे हैं। कई परंपराएं तो ऐसी भी हैं जिनके पैरों तलें इंसानियत रौंदी जा रही हैं।

हम आपको एक ऐसी ही परंपरा के बारे में बताएंगे जिसके चलके इंसानियत रौंदी जा रही हैं, लेकिन इसके बावजूद भी उस परंपरा को मानने वाले लोग उसको आगे चलाएंगे और उनकी आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा का अनुसरण करेगी। तो चलिए अब आपको बतातें हैं कि यह परंपरा क्या है और इसका पालन कहां पर किया जाता है।

मामला मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले के गांव भीडावद की है, जहां पर परंपरा है कि दीवाली के दूसरे दिन यानि की गोर्वधन पूजा वाले दिन एक खास तरीके से गोर्वधन पूजा होती है। इस खास मौके पर एक परंपरा प्रचलित है जिसके चलते इस चार हजार आबादी वाले गांव में से आठ लोगों को चुना जाता है जो अपनी मन्नत मांगते हैं। ये चुनाव मन्नत के मेयार के मुताबिक किया जाता है।

इस परंपरा के चलते गोर्वधन पूजा के बाद सुबह-सुबह इन चुने गए लोगो का जुलूस निकला जाता है, और फिर गांव में बीच चौराहे पर उन्हें लिटा दिया जाता है।  जिसके बाद शुरू होता है गांव की सजी धजी गायों का इन पर से गुज़रने का सिलसिला।

बता दें इस परंपरा के मुताबिक उन आठ लोगों को मन्नत मांगने के बाद 5 दिन पहले ही घर को छोड़ देते हैं और माता के दरबार में रहते हैं। और 5 दिन के बाद उन्हें मां गौरी यानी गायों के आशीर्वाद के लिए तैयार कर के ज़मीन पर लिटा दिया जाता है। अब इसे आस्था कहेंगे या अंधविश्वास ये आप ही सोचिए, क्योंकि कोई भी भगवान या मां अपने पुत्र या भक्तों को कष्ट देकर उनकी इच्छाएं पूरी नहीं करती है, कोई भी मां अपने पुत्र को अपने पैरों तले रौंदती नही है, लेकिन इसे मानने वाले के लिए ये परंपरा उनके दिल के बेहद करीब है। और शायद यही वजह है कि इतने सालों से ये परंपरा बिना रूके चलती आ रही है।

जब इस मान्यता को मानने वाले और इस पूरी क्रिया को करने वाले एक शख्स से पूछा गया तो उसने बताया कि जब वो जमीन पर लेटे होते हैं तो उनको पता भी नहीं चलता की उनके ऊपर से कोई गुजर रहा है।

गांव वालों का कहना है कि यह परंपरा सालों से चलती आ रही है और आगे उनके बच्चे भी इसे चलाएंगे लोग भले ही इसे अंधविश्वास कहते हों लेकिन ये हमारी श्रद्धा है। आजतक इसमें एक भी इंसान जख्मी नहीं हुआ है। इनके मुताबिक गाय माता का अगर एक पैर भी इन पर पड़ गया तो इनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है और साथ ही गौरी माता का आर्शीवाद भी इनको मिल जाता है।

अब इसे क्या नाम दें, श्रद्धा, आस्था, अंधविश्वास या एक ऐसी परंपरा जो बिना किसी सवाल जवाब के सालों से चलती आ रही है कोई भी इसे रोकना नहीं चाहता, उस गांव का हर व्यक्ति इस परंपरा को पीढी़ दर पीढ़ी चलाना चाहता है।

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