नई दिल्ली – भारत को चीन के अड़ियल रवैये के कारण एनएसजी की सदस्यता नहीं मिल सकी। लेकिन भारत अब इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपना सकता है। दरअसल पीएम मोदी कि जापान यात्रा के दौरान भारत और जापान साझा रूप से बयान जारी करेंगे। जिसमें दुनिया को बताया जाएगा कि दक्षिण चीन सागर पर चीन किस तरह अन्य देशों के हितों की अनदेखी कर रहा है।

भारत को मिला जापान का साथ –

दक्षिण चीन सागर पर जापान ने कहा है कि भारत को इस मुद्दे पर अपने हिसाब से सोचना चाहिए। भारत और जापान ने पिछले साल पहली बार साझा वक्तव्य में दक्षिण चीन सागर का जिक्र हुआ था। लेकिन अब पहली बार खुले तौर पर दोनों देश साझा वक्तव्य के माध्यम से कहेंगे कि दक्षिण चीन सागर पर चीन न केवल अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फैसले की अवहेलना कर रहा है बल्कि क्षेत्रीय स्थायित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है।

होगा असैन्य परमाणु  समझौता –

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसी हफ्ते होने वाली दो दिवसीय जापान यात्रा के मद्देनजर भारत और जापान ने ऐतिहासिक असैन्य परमाणु भागीदारी समझौते पर हस्ताक्षर की पूरी तैयारी कर ली है। दोनों देशों की इस पहल से द्विपक्षीय आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को बल मिलेगा और अमेरिकी कंपनियों को भारत में परमाणु संयंत्र स्थापित करने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।

पिछले साल दिसंबर में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत यात्रा पर आए थे, तभी दोनों देशों में असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी पर व्यापक सहमति बन गई थी लेकिन कुछ मसले नहीं सुलझ पाने के कारण इस पर हस्ताक्षर नहीं हो पाया था।

मिलिट्री एयरक्रॉफ्ट शिनमायवा-2i की खरीद पर होगी बात –

भारत और जापान में सिविल न्यूक्लियर डील के साथ-साथ मिलिट्री एयरक्रॉफ्ट शिनमायवा-2i की खरीद पर भी बात बन सकती है। जापान इस मिलिट्री एयरक्रॉफ्ट की कीमतों में कमी करने का भी फैसला कर सकता है। जापान और भारत के बीच इस डील की वजह से चीन को बौखलाहट हो सकती है। चीन ये भी कह सकता है कि दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर भारत बेवजह दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

अगर इस पर सहमति बनती है तो पिछले 50 वर्षों से हथियारों की बिक्री पर लगे प्रतिबंध को प्रधानमंत्री शिंजो आबे द्वारा हटाये जाने के बाद सैन्य साजो-सामान बेचने का यह पहला मौका होगा। इससे यह पता चलता है कि दोनों देशों के बीच रक्षा के क्षेत्र में सहयोग काफी बढ़ रहा है।

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