लोगों के जूठे बर्तन धोने पर मजबूर है कारगिल युद्ध का ये जवान, ऐसी हालत देखकर आ जाएंगे आंसू

भारत की ये पुरानी प्रथा है जो जिंदा है उसे पूछते नहीं और जो नहीं है उसे पूजते-पूजते रुकते नहीं. ये प्रथा बहुत पुरान है और कभी ना रुकने वाली एक दास्तां है जो ना रुकी है और ना रुकने वाली लगती है. तभी तो 26 जुलाई के दिन पूरे देश ने 19वां कारगिल दिवस मनाया. साल 1999 में हुए कारगिल युद्ध में कई जवान शहीद हुए कई घायल हुए लेकिन सबको याद किया जाना शायद देशवासियों की शान के खिलाफ रहा है. लोगों ने कैप्टन विक्रम बत्रा के खत को भी भरपूर शेयर किया लेकिन उस शख्स को भूल गए जो आज भी उस लड़ाई का दर्द सह रहा है. लोगों के जूठे बर्तन धोने पर मजबूर है कारगिल युद्ध का ये जवान, आज उनकी हालत ऐसी हो गई है कि आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे.

आज का नौजवान इंजिनियर बनना चाहता है, डॉक्टर या एक्टर भी बनना चाहता है लेकिन सैनिक नहीं बनना चाहता क्यों ? इसके पीछे की वजह है कि अगर कोई जवान बन भी जाए तो उसके बाद जो परिवार उसके सहारे होता है उसकी देख-रेख सरकार कुछ महीने ठीक से नहीं कर सकती तो हमेशा कैसे करेगी. मगर ऐसा एक सिपाही ने नहीं सोचा था और कारगिल युद्ध में उसने जीत के साथ अपना मान-सम्मान और एक पैर की शक्ति को सिर्फ खोया है. जी हां, हम बात कारगिल युद्ध में घायल हुए लांस नायक सतवीर सिंह की कर रहे हैं. मुखमेलपुर गांव में रहने वाले सतवीर सिंह से नवभारत टाइम्स ने खास बातचीत की और इसमें ये पता चला कि इस जवान ने अपने एक पैर दुश्मन की गोलियां तो खाईं लेकिन उसका सम्मान आज तक उसे भारत सरकार द्वारा नहीं मिला. 19 साल पहले हुए कारगिल युद्ध में सतवीर सिंह को दुश्मनों की गोली ने घायल कर दिया था और वो गोली आज भी उनके पैरों में है और वे बैसाखी का सहारा लेकर चलने पर मजबूर हैं. सतवीर की एक जूस की दुकान है और उसी से वे अपना गुजर बसर कर रहे हैं. सरकारी आंकड़ों में कारगिल युद्ध के समय 527 जवान शहीद और 1300 घायल हुए थे और सतवर सिंह का नाम भी उन घायलों में शामिल है. इस युद्ध में घायल और शहीद के परिवार वालों को सरकार की ओर से पेट्रोल पंप और खेती के लिए जमीन दी जानी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसका सबूत है सतवीर सिंह.

नवभारत टाइम्स से बातचीत करते हुए सतवीर सिंह ने बताया कि 13 जून, 1999 की सुबह कारगिल की तोलालिंग पहाड़ी पर दुश्मन घात लगाए थे और मौका मिलते ही उन्होंने धावा बोल दिया. 15 मीटर की दूरी पर दुश्मन और 9 जवानों की टीम लेकर सतवीर उनके कैप्टन बने थे और उन्होंने हैंड ग्रेनेड फेंककर 7 दुश्मन सैनिकों को मार दिया. सतवीर और उनके कुछ साथी घायल हो गए थे, जबकि उनके 7 जवान शहीद हो गए थे. करीब 17 घंटों तक वे वहीं घायल पड़े रहे, हैलीकॉप्टर भी वहां दुश्मनों की फायरिंग की वजह से लैंड नहीं हो पा रहा था फिर जैसे तैसे उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. करीब 9 दिनों उन्हें शिमला के अस्पताल में रखा गया फिर दिल्ली भेज दिया गया. एक साल तक उनका इलाज चला और पेट्रोल पंप की प्रक्रिया पूरी होते होते 5 बीघा जमीन ही हाथ लगी. उन्होंने उसपर फलों की बगीचा लगाया लेकिन 3 साल बाद वो भी छीन ली गई. उनके दो बेटों की पढ़ाई भी रोक दी गई ये सब देखते हुए उन्होंने एक जूस की दुकान खोल ली और अब वे अपने परिवार का गुजर-बसर दुकान और पेंशन के आधार पर कर रहे हैं. इन 19 सालों में ना उन्हें किसी सरकारी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया ना ही उनकी खबर पीएम, राष्ट्रपति ने ली.

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