20 सालों से कर रहे हैं ये महाकाल की तपस्या, खाने से लेकर घूमना भी है मना, जानिए इन के बारे में

हठयोग शब्द आपने अपने जीवन में कभी न कभी जरूर सुना होगा। हठयोग की बात करें तो इसके बारे में ऐसा बताया जाता है कि यह अंतर्मुखी करने की एक ऐसी प्राचीन भारतीय साधना पद्धति है जिसे पुराने जमाने में साधु और बड़े-बड़े महात्मा किया करते थे। अपने गृहस्थ जीवन को त्याग कर लोग कहीं दूर पहाड़ों में जाकर बिना किसी खानपान के कई दिनों तक साधना किया करते थे। परंतु अगर हम आपको यह बात कहें कि आज के जमाने में भी हठयोग किया जाता है तो शायद आप इस बात के ऊपर यकीन ना कर पाए परंतु। इसलिए आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताने वाले हैं जो कि पिछले 20 साल से हठयोग में लीन है। तो चलिए जानते हैं उस शख्स के बारे में

आपकी जानकारी के लिए बता दे कि आज हम जिस शख्स की बात करने वाले हैं उस शख्स का नाम बाबा सत्यनारायण बताया जाता है। उनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि बाबा सत्यनारायण 16 फरवरी 1998 से लेकर अब तक तपस्या में लीन है। चाहे गर्मी हो या सर्दी बाबा सत्यनारायण बिना छत के हठयोग में लीन रहा करते हैं। हठ योग में लीन रहने वाले इस बाबा को देख कर ही लोगों के संपूर्ण तीर्थ पूरे हो जाते हैं। बचपन से ही अपने आध्यात्मिक स्वभाव की वजह से लोगों के बीच जाने जाने वाले बाबा सत्यनारायण अपने गांव के तालाब किनारे मौजूद शिव मंदिर में जब बचपन के दिनों में 7 दिनों तक भगवान शिव की तपस्या कर रहे थे।

तो उस दौरान उन्हें उनके माता पिता के द्वारा समझा बुझाकर घर वापस बुला लिया गया। बावजूद इसके उनके मन में उसके प्रति उनकी आस्था कभी भी कम नहीं हुई। उनकी आस्था की वजह से ही आज वह हठयोग में लीन हो चुके हैं। हठयोग में लीन होने के बाद से अब तक वहां रहने वाले किसी भी व्यक्ति को इस बात का पता नहीं चल सका है कि आखिर बाबा सत्यनारायण का भोजन करते हैं और कब पानी पीते हैं। अब हम आपको बाबा सत्यनारायण के हठयोगी बनने के पीछे की पूरी कहानी के बारे में बताएंगे।

ऐसा बताया जाता है कि जिस वक्त बाबा सत्यनारायण की उम्र महज 14 साल थी उस दौरान एक दिन वह स्कूल जाने के लिए अपना बैग लेकर निकले परंतु वह स्कूल नहीं गए। स्कूल जाने के बजाए बाबा सत्यनारायण रायगढ़ की ओर चल पड़े और अपने गांव से लगभग 19 किलोमीटर दूर रायगढ़ के सट्टे एक गांव कोसमनारा पहुँच गए। कोसमनारा पहुंचने के बाद उन्होंने बंजर पड़ी जमीन के ऊपर कुछ पत्थरों को एकत्रित कर शिव लिंग का आकार दे दिया। शिव लिंग का आकार देने के बाद उन्होंने अपनी जीभ काटकर सेब को समाप्त कर दी। बाबा सत्यजीत के द्वारा की गई ऐसी हरकत के बारे में किसी भी व्यक्ति को कुछ दिनों तक तो मालूम नहीं पड़ा। परंतु बाद में जब लोगों को यह बात मालूम पड़ी तो कुछ लोगों ने उनके ऊपर निगरानी करनी शुरू कर दी।

लोगों के द्वारा निगरानी किए जाने के बावजूद बाबा सत्यनारायण अपनी तपस्या में लीन रहे। काफी लंबे वक्त तक तपस्या में लीन रहने के बाद लोगों ने इनका नाम बाबा सत्यनारायण रख दिया। ऐसा बताया जाता है कि जब कभी बाबा सत्यनारायण अपनी समाधि से उठते तो वह इशारे इशारे में ही संवाद कर दिया करते हैं। रायगढ़ की पावन धरती को आज एक तीर्थ स्थल बना देने वाले बाबा सत्यनारायण के दर्शन के लिए लोगों का तांता लगा रहता है। यहां पर आने वाले भक्तों के लिए बाबा हर संभव व्यवस्था उपलब्ध करवाया करते हैं। परंतु बाबा स्वयं के सिर के ऊपर छांव करने से भी मना कर रखा है। काफी लंबे समय से आज भी बाबा सत्यनारायण हठयोग में लीन है।

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