विशेष

जब हजारों महिलाओं के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार और केवल 100 दिनों में मारे गए थे 10 लाख लोग,जानें

नई दिल्ली: दुनिया में कई नरसंहार हुए हैं, लेकिन रवांडा नरसंहार को अब तक का सबसे बड़ा नरसंहार माना जाता है। यह नरसंहार अप्रैल 1994 में हुआ था। उस समय 100 दिनों में लगभग 10 लाख लोगों की लाशें बिछ गयी थीं। आपकी जानकारी के लिए बता दें रवांडा के दो समुदायों तुत्सी और हुतु के बीच हुए जातीय संघर्ष ने बड़े नरसंहार का रूप ले लिया था। उस समय 7 अप्रैल 1994 को रवांडा के राष्ट्रपति हेबिअरिमाना और बुरंडियन राष्ट्रपति सिप्रेन की हवाई जहाज पर बोर्डिंग के समय हत्या कर दी गयी थी।

उस समय हुतु समुदाय की सरकार थी। उन्हें लगा कि इस हत्या के पीछे तुत्सी समुदाय का हाथ है। राष्ट्रपति की हत्या के दूसरे दिन ही पुरे देश में नरसंहार शुरू हो गया। हुतु समुदाय के सैनिक भी इस नरसंहार में शामिल हो गए। सैनिको को तुत्सी समुदाय के लोगों को मारने के आदेश दे दिया गया। नरसंहार के कुछ ही दिनों में लगभग 80 हजार से ज्यादा तुत्सी समुदाय के लोगों को मार दिया गया था। कई तो जान बचाने के लिए देश छोड़कर भाग गए थे। यह भयानक नरसंहार लगभग 100 दिनों तक चलता रहा। इस दौरान लगभग 10 लाख लोगों ने अपनी जान गँवाई।

इस नरसंहार में सबसे ज्यादा लोग तुत्सी समुदाय के मारे गए थे। इससे पहले भी कई बार इन दोनों समुदायों के बीच वर्चस्व को लेकर छोटी-मोती झड़पे होती रही थी, लेकिन इस नरसंहार में दोनों समुदायों के लोग मारे गए। इस नरसंहार ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। इस नरसंहार के बाद रवांडा पूरी तरह से बर्बाद हो गया।

यह हादसा इतना भयानक था कि आज भी लोग उसे याद करके डर जाते हैं। इस नरसंहार में सबसे ज्यादा शिकार महिलाओं और बच्चों का हुआ था। हजारों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। इस नरसंहार में बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया।

बच्चों को काटकर फेंक दिया गया था और तुत्सी समुदाय के लोगों को मारने के बाद उनके घरों को लूटकर घर में शवों के साथ आग लगा दी जाती थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें 1918 से पहले रवांडा अन्य देशों की तरह ही शांत देश हुआ करता था। यह देश गरीबी की मार झेल रहा था, लेकिन हिंसा नहीं थी। 1918 में बेल्जियम ने रवांडा पर कज्बा कर लिया। उसके बाद यहाँ जनगणना करवाई गयी। बेल्जियम की सरकार ने रवांडा के लोगों को पहचान पत्र दिए। ये पहचान पत्र तीन जातियों हुतु, तुत्सी और तोवा में बंटे हुए थे। उस विभाजन में बेल्जियम सरकार ने हुतु को रवांडा की सबसे उच्च जाति बताते हुए सरकारी सुविधाएँ देने लगी।

इसके बाद तुत्सी समुदाय के लोग खफा हो गए और संघर्ष की शुरुआत हो गयी। पक्षिमी देशों के दखल के बाद 1962 में रवांडा आजाद हुआ और एक देश बना। 1973 में हुतु समुदाय के हेबिअरिमाना रवांडा के राष्ट्रपति बने। हेबिअरिमाना की प्लेन पर हमला हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गयी। इसी वजह से रवांडा में नरसंहार हुआ था। उस नरसंहार में रवांडा की लगभग 20 प्रतिशत आबादी ख़त्म हो गयी थी। इस नरसंहार में हत्या और बलात्कार की घटनाओं ने आज भी लोगों के दिलों में खौफ जिन्दा कर रखा है। कई महिलाएं आज भी एड्स से पीड़ित हैं और कुछ महिलाएं पैदा हुए बच्चों को अपना बच्चा भी नहीं मानती हैं।

Related Articles

Close