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क्यूँ देना पड़ा भगवान श्री राम जी को अपने ही प्रिय भाई लक्ष्मण को मृत्युदंड ?

हमारे देश के घर घर में रामायण के श्लोक सुनने को मिलते है ! खास कर तब जब कोई राम जी से सम्बंधित त्यौहार आता है जैसे कि दशहरा और दीवाली इन खास मौको पर तो रामायण का ही गुणगान होता है ! रामायण की गाथा के बारे में हर कोई जानता है और ये भी सबको मालूम है कि राम जी ने अपनी प्रिय पत्नी सीता को भी त्यागने का निर्णय किया था ! पर क्या आपको ये मालूम है कि राम जी ने अपने जान से प्रिय भाई लक्ष्मण को ही मृत्यु दंड भी दिया था ! शायद इस व्यथा के बारे में आपने पहले कभी न सुना होगा और न ही कभी रामायण में ये प्रसंग दिखाया गया ! कोई बात नहीं अगर आपको इस बारे में कोई ज्ञान नहीं है तो चलिए हम बताते है कि आखिर रामचंद्र जी को इतना कठोर निर्णय क्यों लेना पड़ा !

वचन निभाने के प्रति संजीदा स्वभाव...

राम जी के बारे में एक बात सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है और वो ये कि राम जी कभी अपने वचन से नहीं मुकरते थे ! उन्होंने एक बार जो वचन दे दिया उसे पूरा करके ही रहते थे ! तो एक बार यम देवता राम जी से मिलने उनके राज्य आये और उन्हें राम जी से किसी खास विषय पर बात करनी थी ! पर बात करने से पहले यम देवता ने राम जी से कहा कि हे प्रभु आप जो भी प्रतिज्ञा लेते है उसे आवश्य पूरा करते है ! इसलिए मै भी आपसे एक वचन लेना चाहता हो कि जब हम बात करे तो इस दौरान कोई भी हमारी वार्तालाप के दरमियान न आये ! अगर कोई भी हमारी बात चीत के दौरान बीच मै आया तो आप उसे मृत्यु दंड देंगे ! राम जी ने यम देवता को वचन दिया कि ऐसा ही होगा ! तब राम जी ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को आदेश दिया कि किसी को भी अंदर न आने दिया जाये और यदि कोई मिलने आये तो उसे बाहर द्वार पर ही रोक दिया जाये ! लक्ष्मण जी अपने भाई का आदेश मान कर बाहर द्वारपाल बन कर खड़े हो गए !

ऋषि दुर्वासा का आगमन ..

अभी कुछ ही समय बीतता है कि द्वार पर ऋषि दुर्वासा आ जाते है और वो राम जी से मिलने की इच्छा ज़ाहिर करते है ! पर इस स्थिति मै लक्ष्मण दुविधा मै पड़ जाते है क्योंकि वो ऋषि जी को अंदर नहीं जाने दे सकते ! इसलिए लक्ष्मण बड़े ही विनर्म भाव से ऋषि दुर्वासा को वही द्वार पर ही रोक लेते है ! जिससे ऋषि क्रोधित हो जाते है और पूरी अयोध्या को श्राप देने की बात कहते है ! इससे लक्ष्मण जी डर जाते है क्योंकि वो अपनी अयोध्यानगरी को श्राप नहीं दिलवाना चाहते ! इसलिए उन्होंने तय किया कि वो खुद दंड भुगतने के लिए तैयार है पर अयोध्या को दण्डित नहीं कर सकते ! उन्होंने कक्ष मै जाकर जैसे ही राम जी को दुर्वासा जी के आने की खबर दी तो वो तुरंत ऋषि दुर्वासा की सेवा भक्ति मे लग गए !

राम जी को यम देवता को दिया हुआ अपना वचन निभाना था

पर इसके बाद राम जी के लिए एक बड़ी विपति खड़ी हो गयी क्योंकि राम जी को यम देवता को दिया हुआ अपना वचन निभाना था ! अपने इसी वचन के चलते राम जी बहुत बड़ी शंका मे पड़ गए और तब उन्होंने गुरु का ध्यान किया और जब गुरु जी से रास्ता पूछा तो गुरु जी ने कहा कि यदि हम अपने किसी प्रिय का त्याग कर दे तो वो मृत्यु के समान ही होता है ! अर्थात इसका मतलब था कि राम जी अपने भाई का लक्ष्मण का त्याग कर उसे खुद से दूर कर दे जिससे उनका वचन भी पूरा हो जायेगा और लक्ष्मण जी मृत्यु से बच पाएंगे ! पर लक्ष्मण को ये गवारा न था और उन्होंने राम जी से कहा कि नहीं भ्राता मैं आपका अनुज हु और मुझे मृत्यु मंज़ूर है पर आप मेरा त्याग न करे ! इसलिए तब लक्ष्मण जी ने ये कह कर हमेशा के लिए जल समाधि ले ली ! तो तरह रामायण में लक्षमण जी की गाथा का अंत हुआ !

ये सब जानने के बाद इतना तो समझ आ ही गया होगा कि राम बनना बहुत ही मुश्किल है ! वरना आज के समय में कौन सा व्यक्ति अपना वचन निभाने के लिए अपने प्रिय को मौत के हवाले करता है ! ये केवल राम ही कर सकते थे ! इसलिए तो उनके लाखो करोड़ो भक्त है जो आज भी राम जी की छवि को भुलाये नहीं भूलते और न कभी भूलेंगे !

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