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नरेंद्र मोदी के इस कदम से मचा मुस्लिम कट्टरपंथियों में हड़कंप !

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि वह ट्रिपल तलाक (Tripel Talaq and uniform civil code) का कड़ा विरोध करेगा। बोर्ड ने यह भी कहा है कि अगर देश में ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) के प्रावधान को ख़त्म किया गया तो वह इसके विरोध में खड़ा होगा। बोर्ड का कहना है कि भारत में केवल हिन्दू ही नहीं रहते हैं यहाँ पर बहुत से धर्मों के लोग रहते हैं और हमें सबकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और उसी के अनुरूप कोई भी कानून बनाना चाहिए। बोर्ड ने कहा कि सबको एक ही नजर से देखना उचित नहीं है सबकी जरूरतों को समझना चाहिए।

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आपको बता दें कि पहले से ही ट्रिपल तलाक (Triple Talaq)  को लेकर राजनीतिक गलियारों में गहमा- गहमी हो रही है। कुछ दिनों पहले इसपर डा. स्वामीनाथ का बयान आया था। उन्होंने कहा था कि अगर वह नहीं मानते हैं तो कानून बनाकर जबरदस्ती लागू कर दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया एयर अमेरिका जैसे देशों में समान नागरिकता कानून है।

क्या है समान नागरिकता कानून (uniform civil code) :

समान नागरिक संहिता का अर्थ एक पंथनिरपेक्ष (सेक्युलर) कानून होता है जो सभी धर्म के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है। दूसरे शब्दों में, अलग-अलग धर्मों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ का मूल भाव है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के वैसे समूह से है जो देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी धर्म या क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। विश्व के अधिकतर आधुनिक देशों में ऐसे कानून लागू हैं।

समान नागरिकता कानून के अंतर्गत (uniform civil code):

• व्यक्तिगत स्तर
• संपत्ति के अधिग्रहण और संचालन का अधिकार
• विवाह, तलाक और गोद लेना

समान नागरिकता कानून, भारत के संबंध में है, जहां भारत का संविधान राज्य के नीति निर्देशक तत्व में सभी नागरिकों को समान नागरिकता कानून सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। हालांकि इस तरह का कानून अभी तक लागू नहीं किया जा सका है।

भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिक्ख , जैन और बौद्ध हिंदू विधि के अंतर्गत आते हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई के लिए अपने कानून हैं। मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है। अन्य धार्मिक समुदायों के कानून भारतीय संसद के संविधान पर आधारित हैं।

इतिहास:

1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। इस कानून के कारण धर्मनिरपेक्ष और मुसलमानों के बीच खाई और गहरी हो गई। वहीं, कुछ मुसलमानों ने बदलाव का विरोध किया और दावा किया कि इससे देश में मुस्लिम संस्कृति ध्वस्त हो जाएगी।

यह विवाद ब्रिटिशकाल से ही चला आ रहा है। अंग्रेज मुस्लिम समुदाय के निजी कानूनों में बदलाव कर उससे दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे। हालांकि विभिन्न महिला आंदोलन के कारण मुसलमानों के निजी कानूनों में थोड़ा बदलाव हुआ।

वर्तमान परिदृश्य:

भारत में गोवा ही एक ऐसा राज्य हैं जहाँ पर यह कानून लागू है। वहाँ सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ही कानून है और यह सबपर लागू होता है। वहाँ जन्म से लेकर शादी और मृत्यु  तक की सारी प्रक्रिया इसी के अंतर्गत की जाती है, चाहे वह मुस्लिम हो, हिन्दू हो या ईसाई  हो। सभी इस कानून के दायरे में आते हैं।

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