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भारत के खिलाफ पाक की ‘चीनी साजिश’, अब चीन को उसकी औकात दिखाएगी भारत की जनता, जानिए कैसे…

नई दिल्ली: देश में जब से उरी का आतंकवादी हमला हुआ है और हमारे देश के वीर जवान शहीद हुए हैं, तब से भारतीयों में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा भड़क रहा था। सभी हिन्दुस्तानी सिर्फ यही चाहते थे कि, पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए। और इस बार इस हमले का बदला भारतीय सेना ने ले लिया। पैरा कमांडोज ने पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर में घुसकर 7 कैम्प्स तबाह कर दिए और करीब 38 आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया। China Market India, China Products.

भारत सरकार पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी जल समझौता और सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा वापस लेने की तैयारी कर रही है। लेकिन पाकिस्तान कि नापाक हरकतें जारी हैं। पाकिस्तान लगातार भारत में आतंकी घुसपैठ कराने के लिए सीजफायर का उल्लघंन कर रहा है। यहां तक की उसकी इन हरकतों में चीन भी उसका साथ दे रहा है। चीन ने पाकिस्तान की शह पर तिब्बत में ब्रह्मपुत्र का पानी रोका। यूएन में अपने वीटो पावर का उपयोग करके जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकी मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने का विरोध किया है। भारत के एनएसजी सदस्यता के प्रयास में वह रोड़ा बना।

यह भारत के खिलाफ पाक की ‘चीनी साजिश’ है। जिसका भारत की जनता ने मुंहतोड़ जवाब देने का मन बना लिया है। देशभर में चीन के बने समान का बहिष्‍कार करने की अपील की जा रही है। यही नहीं चीन के खिलाफ भारतीयों का गुस्सा सोशल मीडिया पर भी दिख रहा है। ट्वीटर, फेसबुक पर लोग #BoycottChineseProducts लिखकर चीनी प्रोडक्ट्स पर बैन लगाने और इनके इस्तेमाल नहीं करने की अपील कर रहे हैं। स्वामी रामदेव और भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने चीन के सामान, चीन के साथ व्यापार का बहिष्कार करने का आह्वान किया है।

आइए जानते हैं भारत-चीन का कितना व्यापार है और देश में कैसे ‘मेड इन चाइना’ की बाढ़ आ गई…

भारत-चीन व्यापार –

अप्रैल से दिसंबर 2014 के बीच चीन से आयात 46 अरब डॉलर को छू गया था जो भारत के कुल आयात के 13 फीसदी से ज्यादा था और भारत के दूसरे नंबर के निर्यातक संयुक्त अरब अमीरात से आए माल का दोगुना था। भारत में चीन से निर्यात का बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का है। इसकी तुलना में भारत से चीन को निर्यात अप्रैल से दिसंबर 2014 के बीच सिर्फ 9 अरब डॉलर का था। यानी फासला 37 अरब डॉलर का है।

इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की मांग –                 

पिछले सितंबर में जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग गुजरात और दिल्ली के दौरे पर भारत आए थे तो मोदी और उनके बीच व्यापार को संतुलित करने के तरीकों पर बात हुई थी। तब चीन ने अगले पांच साल में 20 अरब डॉलर के निवेश और गुजरात तथा महाराष्ट्र में उत्पादन के लिए चीनी औद्योगिक पार्क की स्थापना की घोषणा की। लेकिन इन घोषणाओं पर अब तक मामूली प्रगति ही देखने को मिली है। इसके चलते चीनी निवेशकों में यह धारणा पैदा हुई है कि “मेक इन इंडिया” अभियान के बावजूद जमीन पर कुछ नहीं बदला है।

बेडरूम से बाथरूम तक चीनी सामान –

करीब एक दशक पहले भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ आई थी। इसके पीछे कमजोर युआन (चीन की मुद्रा), मूल्यों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में सहयोग करने वाले थोक उत्पादन पर बल और भारत की अपनी उत्पादन क्षमताओं में कमियां जिम्मेदार थीं। सस्ता माल पाकर भारतीय काफी खुश हुए थे और धीरे-धीरे देश भर में चीनी सामान का ढेर लग गया। इसकी मार कमजोर देसी उत्पादकों पर पड़ी। कई छोटी भारतीय इकाइयों पर ताला पड़ गया, जबकि बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे ठौर तलाशने लगीं।

चीनी निर्यात पर भारत की निर्भरता को सबसे बेहतर ऊर्जा क्षेत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है। आज भारतीय परियोजनाओं के लिए करीब 80 फीसदी पावर प्लांट उपकरण चीन से मंगाए जा रहे हैं। तात्कालिक फायदा यह हुआ है कि ऊर्जा की कमी के इस दौर में चीनी उपकरणों ने भारतीय कंपनियों को अपनी क्षमता बढ़ाने में मदद की है।

सस्ते का बोलबाला –

अकेले ऊर्जा उत्पादकों को ही चीनी आयात की ताकत से रू-ब-रू नहीं होना पड़ा है। चीन से थोक में पीवीसी पाइप मंगवाने वाले दिल्ली स्थित रमेश गुप्ता कहते हैं कि सिंचाई परियोजनाओं के कारण पीवीसी पाइपों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है और चीन से आयात करने में आसानी हो रही है। वे कहते हैं, “मुंबई से सटे नावा शेवा बंदरगाह पर चीन से आने वाला एक टन पीवीसी पाइप 910 डॉलर का पड़ता है जबकि घरेलू उत्पाद की कीमत 1050 डॉलर है।”

ऑटो पार्ट्स एक और क्षेत्र है जिसे चीनी आयात की बाढ़ से संघर्ष करना पड़ रहा है। 2013-14 में चीन से इंजन पिस्टन, ट्रांसमिशन ड्राइव, स्टीयरिंग और बॉडी कंपोनेंट का आयात कुल 2.6 अरब डॉलर रहा है और भारत में होने वाले ऑटो पार्ट्स आयात का 21 फीसदी रहा है जिसने आयात के मामले में 15 फीसदी वाले जर्मनी को पीछे छोड़ दिया है। दूसरी ओर भारत ने सिर्फ 30 करोड़ डॉलर के पार्ट्स चीन को निर्यात किए।

नकली सामान के निर्यात में सबसे आगे चीन –

चीन हर साल 500 अरब डालर यानी 33 लाख करोड़ रुपए का नकली और पायरेटेड सामान दुनियाभर में सप्लाई करता है। वैश्विक स्तर पर जब्त आयातित नकली उत्पादों में 63.2 प्रतिशत के साथ चीन पहले स्थान पर है। इसका सर्वाधिक नुकसान यूरोपीय संघ व अमेरिका की कंपनियों को उठाना पड़ रहा है। नकली वस्तुओं के व्यापार से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में अमेरिका पहले नंबर पर है।  चीन हर साल अमेरिका में 32 लाख करोड़ का निर्यात करता है जिसमें ज्यादातर चीजें नकली होती है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसीडी) की रिपोर्ट से भी यह प्रमाणित हो चुका है।

चीनी सामान पर बैन –

भारत सरकार ने चीन से आने वाले घटिया प्रकार के दूध व दुग्ध उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया। साथ ही कुछ विशेष प्रकार के मोबाइल फोनों को 24 अप्रैल 2016 में बैन किया।  इससे पहले 23 जनवरी 2016 को भी चीनी खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था। 27 अप्रैल 2016 को लोकसभा में भाजपा की ओर से ही चीनी मांझे का मुद्दा उठाया गया। मोदी सरकार ने हाल ही में चीन से आयातित पटाखों पर बैन लगाया है।

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