पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिन पर नेताओं को देना पड़ेगा ये गिफ्ट, तभी विश होगी कबूल

एक तरफ जहां देश में नए नए दलित नेता आए दिन पैदा हो रहे हैं, चाहे वे सहारनपुर का रावण हो, या गुजरात में हाल ही में विधायक बने जिग्नेश मेवानी हो, लेकिन देश की पहली दलित महिला नेता मायावती का  के दिन इन दिनों गर्दिश में है। चाहे उनके नेता हों जो दिन ब दिन पार्टी छोड़ते जा रहे हैं, या दलितों के नए नेताओं के आने से उनका कम होता प्रभाव और चमक कम होती जा रही है। लेकिन उनका अंदाज आज भी कायम हैं। क्योंकि तमाम आरोपों, असफलताओं को दरकिनार करते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती अपना 62वां जन्मदिन आर्थिक दिवस के तौर पर मनाएंगी। जिसके लिए उन्होने जन्म दिवस के अवसर पर पार्टी के नेताओं से ऐसा गिफ्ट मांगा है। जिसको देने के बाद ही वो उनकी शुकामनाएं स्वीकार करेंगी।

बताते चलें कि बसपा सुप्रीमो मायावती की अदूरदर्शी नीतियों के चलते 2008 से लेकर 2016 तक हुए राज्यों के विधान सभा और लोकसभा के चुनाव में बसपा को निरंतर करारी हार का सामना करना पड़ा। साथ ही दलितों का मायावती से मोह भी भंग हुआ। लेकिन 2016 में हुए यूपी के नगर निकाय चुनाव ने बसपा को मिली कुछ सीटों पर सफलता ने राहत जरूर दी। इसी राहत को अब बसपा 15 जनवरी 2018 को बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर कैश करवाने की तैयारी है।

जन्मदिन के मौके पर पार्टी ने बकायदा एक इन हाउस सर्कुलर जारी किया है। जिसमे पदाधिकारी, कार्यकर्ताओं,विधायकों और प्रत्येक सांसदों से 50 हजार रुपए के हिसाब से पार्टी के कोष में जमा कराने के निर्देश दिए हैं। बसपा के छोटे-बड़े पदाधिकारी पार्टी फंड में ज्यादा से ज्यादा धन जमा करवाने की मुहिम में जुट गए हैं।

बसपा सूत्रों का कहना है कि कई चुनावों में मिली पार्टी की करारी हार से बसपा को मनमुताबिक चंदा नहीं मिल पा रहा था। यूं तो बसपा सुप्रीमो मायावती हर साल अपना जन्मदिन आर्थिक सहयोग दिवस के रूप में मनाती हैं। पहले अपने जन्म दिन पर एक लाख रुपए से कम का चंदा स्वीकार नहीं करती थी। लेकिन पार्टी को कई चुनावों में मिली हार से बसपा को अब चंदा भी कम मिल रहा है। इस बार बसपा ने प्रत्येक जिला अध्यक्ष को 500 लोगों को बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलवाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य के तहत प्रत्येक को 50 हजार रुपए जमा करवाने हैं। यही लक्ष्य पार्टी के वर्तमान और पूर्व विधायकों और सांसदों को दिया गया है।

कभी बसपा सुप्रीमो मायावती खास लोगों में सुमार लोगों का कहना है कि पैसे की भूख ने बाबा साहब और कांशीराम के मिशन और पार्टी को रसाताल में पहुंचा दिया है। जिसका खामियाजा दलित समाज को भुगतना पड़ रहा है। राजनीतिक पार्टियां दलितों को मात्र एक वोट बैंक की नजर से ही देखती हैं। इस वोट बैंक पर बसपा का कब्जा मानती हैं। बहनजी में पैसे लेने की एक बीमारी लग गई है। इस बीमारी ने आयरन लेडी की छवि को धूमिल किया है।

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